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নিষ্পাপ নিবেদন

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  নিষ্পাপ নিবেদন এ কোন অচেনা পথে,নিয়ে চলেছো প্রভু এমন দিনের কথা ভাবিনী তো কভু মানুষের হাহাকার,শুনতে কি আর পারোনা? অনেক হয়েছে আড়ি,এবার ছাড়ো না নিমেষে চোখের, প্রভু,কতোই না প্রান গেল এই দুগ্ধপোষ্য শিশু,তাদের কি দোষ বল? নির্দোষ নারী পুরুষ,কতই না আছে আর তাদের কথা ভেবেই,না হয় করলে বিচার এবার শান্ত হও,রাগ আর সয় না শুনেছি মায়ের কাছে,কুমাতা যে হয় না মাতা তুমি,পিতা তুমি,মোরা তব সন্তান তোমারই অ‌ংশ তবে কেনো এতো অভিমান? সকল অভিমান ছাড়ি,এসো না ভাব করি নিষ্পাপ এ মনের,রাখবে না নিবেদন???

ग़म का शिकार

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दुनियां   ने कहा-रोशनी की तुमको क्या फिकर, अंधेरों से लड़ने को तो दीपक तैयार हैं। हमनें कहा कि कैसे दीए कैसी रोशनी? बुझा दो दीए, हमको अंधेरों से प्यार है। दुनियां ने कहा- मांगा था इक फूल ही तुमने, नज़रें उठाके देखो तो, छाई बहार है। हमनें कहा ये सोचके फिर आएगा पतझड़, बहते हमारी आंखों से आंसू हज़ार हैं। दुनियां ने कहा- चाहा था दिलों को जीतना, आख़िर में हुई उसमें भी तेरी ही हार है। हमनें कहा कि इसमें नहीं दोष किसी का, हमको है ये मालूम ,ये किस्मत की मार है। दुनियां ने कहा- होती है जब दिल को कोई ख़ुशी, नग्में ख़ुशी के छेड़ते तब दिल के तार हैं। हमनें कहा- बज सकते नहीं राग ख़ुशी के, ये दिल हमारा टूटा हुआ वो सितार है। दुनियां ने कहा- कैसा तू इंसान है बता? खुशियों   से नहीं, क्यों तुझे इस गम से प्यार है? खुशियां तो मिली, प्यार के दो बोल ना मिले, हमनें कहा कि उनसे जिनपे जान निसार है। दुनियां ने कहा- छोड़ उन्हें,अपनी कर फिकर, उनके लिए क्यों फ़िक्र तुझे बार बार है। हमने कहा कि छोड़ नहीं सकते हम उन्हें, नफ़रत ही मिली चाहे हमें बेशुमार है। अपनों ने जुदा कर दिया, इस डर से हमें कि, उनकी ...

अरमान

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हार गई हूं किस्मत से,आदत हो गई है रोने की। क्या मुझको दे सकते हो? बस एक वजह खुश होने की। सुना था कई इंसानों ने,  पत्थर में भी फूल खिलाए हैं। खुशियां उसकी बांदी जिसने,   पतझड़ में भी बाग़ सजाए हैं। हमनें भी तो चाहा था यही, कोशिश अपनी नाकाम रही, इस दिल की बंजर धरती को,  अश्कों से अपने भिगोने की। कहते हैं जैसा बोता है,  वैसा ही ख़ुद भी पाता है। गर राह सही मिल जाए तो,  मंज़िल पे पहुंच ही जाता है। क्या रखा है रोने धोने में,  अपनी बगिया को संजोने में, की कमी कहां थी हमने भी,  खुशियों के बीज को बोने की। गर इंसान में हिम्मत हो तो, हर मुश्किल हल हो जाती है। गैरों में खुशियां बांटे तो,   जन्नत हासिल हो जाती है। थी हिम्मत तो काफ़ी हममें, ये बात मगर जानी हमने, है बहुत ज़रूरी ताकत भी,  ख़ुद अपनी लाश को ढोने की। ये आंखें बहुत ही रोई हैं, इनका सपना साकार करो। ले लो मेरा जीवन सारा, मुझको थोड़ा सा प्यार करो। इतने में खुश हो लूंगी मैं,  फ़िर कभी नहीं रोऊंगी मैं, बस डाल दो मेरी झोली में,  सिर्फ एक वजह ख़ुश होन...

आख़िर इक दिन जाना है।

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आए थे इक रोज़ जहां से, वहीं तो आख़िर जाना है। घर-बार,प्यार, रिश्ते-नाते,सब यहीं धरा रह जाना है।। जब धरती पर आने के लिए, ईश्वर ने हमें तैयार किया। तन ढकने को भी मानव को, एक पत्ता तक ना दान किया। ईश्वर ने कहा- ऐ मानव सुन, तुझको धरती पर जाना है। मैंने जैसा तैयार किया, वैसे ही वापस आना है। धरती पर पहले आते ही, मानव ने सीख लिया रोना। आंसू ही साथ निभाते हैं, जब पड़ जाता है कुछ खोना।। विश्वास पे अपनी चोट लगे, तो क्यों आंखें भर आती हैं? जीवन की छोटी सी ठोकर, क्यों चोट हमें पहुंचाती है? क्या आए थे लेकर जग में, क्यों आशा है कुछ पाने की? कुछ साथ नहीं ले पाएंगे, जब होगी बेला जाने की। फिर चाह हमें क्यों जीवन में, औरों का हमको प्यार मिले? हर कोई चाहे मुझको भी, सपनों का इक संसार मिले। दुःख,दर्द, हंसी और खुशियों को, आख़िर इक दिन बह जाना है। मिट्टी से बनी इस देह को आख़िर, मिट्टी में मिल जाना है। आए थे इक रोज़ जहां से वहीं तो आख़िर जाना है। घर-बार, प्यार, रिश्ते- नाते सब यहीं धरा रह जाना है।।

मेरा परिचय

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मैं तो इक फूल हूं जिसको बहारें छोड़ गईं, मैं वो इक शाख़ हूं जिसको हवा भी तोड़ गई। मैं एक राही हूं जिसका ना कोई नाम ना घर, ना जाने कौन सी मंज़िल है कहां ख़त्म सफ़र। मैं कोई बूंद हूं जिसकी है छोटी ज़िंदगानि, ना, मैं बरसात नहीं हूं, हूं आंख का पानी। मैं इक लहर हूं शायद थक के कभी चूर हुई, किनारे आके बिखर जाने को मजबूर हुई। मैं हूं वो घांस दुनिया बैठी और आराम किया, उठे और चल दिए, पावों के तले रौंद दिया। मैं हूं एक राह में पड़ा हुआ बेबस पत्थर, गुज़रने वाले हर इक पांव ने मारी ठोकर। मैं इक किताब हूं जिसमें लिखी है सच्चाई, ना ही समझा है किसीने ना दुनियां पढ़ पाई। मैं इक दीया हूं जिसने भूल बस इतनी की है, जला है ख़ुद मगर औरों को रोशनी दी है। मैं आईना हूं जिसपे सबको है अभिमान बड़ा, दिखाई असली जो सूरत तो टूटना ही पड़ा। मैंने चाहा था किसी रोज़ गगन को छूना, आज मैं नीचे हूं ज़मीन के उससे दूना। वैसे सोचो तो निकल आएंगे कई नाम मेरे, छुपा हुआ हूं उसीमे जिसे है दर्द घेरे। ना मुझको समझो के हर दर्द की पहचान हूं मैं, मैं कोई और नहीं हूं बस एक इंसान हूं मैं। मैं को...

हम किधर जाएं ????

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है हिम्मत किसी भी राह से गुज़र जाएं, नहीं मालूम हो मंज़िल तो हम किधर जाएं ? हवा में बिखरी है ख़ुशबू चमन के फूलों की, गर ख़ुशबू से हो घुटन तो हम किधर जाएं ? नहीं गिला कोई चिरागों के ग़ुल होने से, जो उजाला ही हो दुश्मन तो हम किधर जाएं ? काम कांटों का है, फूलों का नहीं है चुभना, जो फूलों से लगे चोट हम किधर जाएं ? चेहरों में क्या रक्खा है वो तो हैं नकली, जो दिलों में ही हो खोट हम किधर जाएं ? ख़्वाब हसीन तो होते हैं मगर आँख खुले, कुछ भी ना हो हासिल तो हम किधर जाएं ? नहीं परवाह कोई ग़ैर जो जज़्बात से खेले, उनमें अपने भी हों शामिल तो हम किधर जाएं ? चले जायेंगे जहान से जो आएगी बारी, रो रोके पूछेगी उस दिन भी ख़ाक बेचारी। या तो मिल जाएं इस मिट्टी में या बिखर जाएं, बता मालिक मेरे, मर कर भी हम किधर जाएं?

मेरा घर

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जीवन की धूप और छांव में मिलता है कुछ आराम जहां कितने ही झोंखे तूफान के आये तो हों नाकाम जहां जहां खुशियों के शीतल झरने हर पल इक सुर में बहते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। जहां सुबह की किरणे आकर खेला करती हैं आंगन में जहां बरखा की बूंदें रिमझिम रिमझिम गिरती हैं सावन में जहां इन्द्रधनुष के सातों रंग आपस में मिलकर रहते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। जहां सुख दुःख सारे जीवन के आपस में बांटे जाते हैं जहां दीप जलाकर खुशियों के हर इक त्योहार मनाते हैं दुःख सागर की उठती लहरें जहां सब मिलजुलकर सहते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। मेहनत की अग्नि में जलकर जहां कंचन होती है काया जहां शाम ढले थक जाने पर मिले ममता की शीतल छाया नादान सभी ठोकर खाकर जहां गिरते और संभलते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। जहां मन में इच्छा हो चलने की नई आशा की राह में आकाश सा ऊपर उठने में, सूरज छूने की चाह में जहां हर इक काली रात कटे और दिन भी रोज़ गुजरते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं।