मेरा घर
जीवन की धूप और छांव में मिलता है कुछ आराम जहां
कितने ही झोंखे तूफान के आये तो हों नाकाम जहां
जहां खुशियों के शीतल झरने हर पल इक सुर में बहते हैं,
उसको ही तो घर कहते हैं।
जहां सुबह की किरणे आकर खेला करती हैं आंगन में
जहां बरखा की बूंदें रिमझिम रिमझिम गिरती हैं सावन में
जहां इन्द्रधनुष के सातों रंग आपस में मिलकर रहते हैं,
उसको ही तो घर कहते हैं।
जहां सुख दुःख सारे जीवन के आपस में बांटे जाते हैं
जहां दीप जलाकर खुशियों के हर इक त्योहार मनाते हैं
दुःख सागर की उठती लहरें जहां सब मिलजुलकर सहते हैं,
उसको ही तो घर कहते हैं।
मेहनत की अग्नि में जलकर जहां कंचन होती है काया
जहां शाम ढले थक जाने पर मिले ममता की शीतल छाया
नादान सभी ठोकर खाकर जहां गिरते और संभलते हैं,
उसको ही तो घर कहते हैं।
जहां मन में इच्छा हो चलने की नई आशा की राह में
आकाश सा ऊपर उठने में, सूरज छूने की चाह में
जहां हर इक काली रात कटे और दिन भी रोज़ गुजरते हैं,
उसको ही तो घर कहते हैं।

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