हम किधर जाएं ????
नहीं मालूम हो मंज़िल तो हम किधर जाएं ?
हवा में बिखरी है ख़ुशबू चमन के फूलों की,
गर ख़ुशबू से हो घुटन तो हम किधर जाएं ?
नहीं गिला कोई चिरागों के ग़ुल होने से,
जो उजाला ही हो दुश्मन तो हम किधर जाएं ?
काम कांटों का है, फूलों का नहीं है चुभना,
जो फूलों से लगे चोट हम किधर जाएं ?
चेहरों में क्या रक्खा है वो तो हैं नकली,
जो दिलों में ही हो खोट हम किधर जाएं ?
ख़्वाब हसीन तो होते हैं मगर आँख खुले,
कुछ भी ना हो हासिल तो हम किधर जाएं ?
नहीं परवाह कोई ग़ैर जो जज़्बात से खेले,
उनमें अपने भी हों शामिल तो हम किधर जाएं ?
चले जायेंगे जहान से जो आएगी बारी,
रो रोके पूछेगी उस दिन भी ख़ाक बेचारी।
या तो मिल जाएं इस मिट्टी में या बिखर जाएं,
बता मालिक मेरे, मर कर भी हम किधर जाएं?

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