अरमान
हार गई हूं किस्मत से,आदत हो गई है रोने की। क्या मुझको दे सकते हो? बस एक वजह खुश होने की। सुना था कई इंसानों ने, पत्थर में भी फूल खिलाए हैं। खुशियां उसकी बांदी जिसने, पतझड़ में भी बाग़ सजाए हैं। हमनें भी तो चाहा था यही, कोशिश अपनी नाकाम रही, इस दिल की बंजर धरती को, अश्कों से अपने भिगोने की। कहते हैं जैसा बोता है, वैसा ही ख़ुद भी पाता है। गर राह सही मिल जाए तो, मंज़िल पे पहुंच ही जाता है। क्या रखा है रोने धोने में, अपनी बगिया को संजोने में, की कमी कहां थी हमने भी, खुशियों के बीज को बोने की। गर इंसान में हिम्मत हो तो, हर मुश्किल हल हो जाती है। गैरों में खुशियां बांटे तो, जन्नत हासिल हो जाती है। थी हिम्मत तो काफ़ी हममें, ये बात मगर जानी हमने, है बहुत ज़रूरी ताकत भी, ख़ुद अपनी लाश को ढोने की। ये आंखें बहुत ही रोई हैं, इनका सपना साकार करो। ले लो मेरा जीवन सारा, मुझको थोड़ा सा प्यार करो। इतने में खुश हो लूंगी मैं, फ़िर कभी नहीं रोऊंगी मैं, बस डाल दो मेरी झोली में, सिर्फ एक वजह ख़ुश होन...