Posts

Showing posts from July, 2020

अरमान

Image
हार गई हूं किस्मत से,आदत हो गई है रोने की। क्या मुझको दे सकते हो? बस एक वजह खुश होने की। सुना था कई इंसानों ने,  पत्थर में भी फूल खिलाए हैं। खुशियां उसकी बांदी जिसने,   पतझड़ में भी बाग़ सजाए हैं। हमनें भी तो चाहा था यही, कोशिश अपनी नाकाम रही, इस दिल की बंजर धरती को,  अश्कों से अपने भिगोने की। कहते हैं जैसा बोता है,  वैसा ही ख़ुद भी पाता है। गर राह सही मिल जाए तो,  मंज़िल पे पहुंच ही जाता है। क्या रखा है रोने धोने में,  अपनी बगिया को संजोने में, की कमी कहां थी हमने भी,  खुशियों के बीज को बोने की। गर इंसान में हिम्मत हो तो, हर मुश्किल हल हो जाती है। गैरों में खुशियां बांटे तो,   जन्नत हासिल हो जाती है। थी हिम्मत तो काफ़ी हममें, ये बात मगर जानी हमने, है बहुत ज़रूरी ताकत भी,  ख़ुद अपनी लाश को ढोने की। ये आंखें बहुत ही रोई हैं, इनका सपना साकार करो। ले लो मेरा जीवन सारा, मुझको थोड़ा सा प्यार करो। इतने में खुश हो लूंगी मैं,  फ़िर कभी नहीं रोऊंगी मैं, बस डाल दो मेरी झोली में,  सिर्फ एक वजह ख़ुश होन...

आख़िर इक दिन जाना है।

Image
आए थे इक रोज़ जहां से, वहीं तो आख़िर जाना है। घर-बार,प्यार, रिश्ते-नाते,सब यहीं धरा रह जाना है।। जब धरती पर आने के लिए, ईश्वर ने हमें तैयार किया। तन ढकने को भी मानव को, एक पत्ता तक ना दान किया। ईश्वर ने कहा- ऐ मानव सुन, तुझको धरती पर जाना है। मैंने जैसा तैयार किया, वैसे ही वापस आना है। धरती पर पहले आते ही, मानव ने सीख लिया रोना। आंसू ही साथ निभाते हैं, जब पड़ जाता है कुछ खोना।। विश्वास पे अपनी चोट लगे, तो क्यों आंखें भर आती हैं? जीवन की छोटी सी ठोकर, क्यों चोट हमें पहुंचाती है? क्या आए थे लेकर जग में, क्यों आशा है कुछ पाने की? कुछ साथ नहीं ले पाएंगे, जब होगी बेला जाने की। फिर चाह हमें क्यों जीवन में, औरों का हमको प्यार मिले? हर कोई चाहे मुझको भी, सपनों का इक संसार मिले। दुःख,दर्द, हंसी और खुशियों को, आख़िर इक दिन बह जाना है। मिट्टी से बनी इस देह को आख़िर, मिट्टी में मिल जाना है। आए थे इक रोज़ जहां से वहीं तो आख़िर जाना है। घर-बार, प्यार, रिश्ते- नाते सब यहीं धरा रह जाना है।।

मेरा परिचय

Image
मैं तो इक फूल हूं जिसको बहारें छोड़ गईं, मैं वो इक शाख़ हूं जिसको हवा भी तोड़ गई। मैं एक राही हूं जिसका ना कोई नाम ना घर, ना जाने कौन सी मंज़िल है कहां ख़त्म सफ़र। मैं कोई बूंद हूं जिसकी है छोटी ज़िंदगानि, ना, मैं बरसात नहीं हूं, हूं आंख का पानी। मैं इक लहर हूं शायद थक के कभी चूर हुई, किनारे आके बिखर जाने को मजबूर हुई। मैं हूं वो घांस दुनिया बैठी और आराम किया, उठे और चल दिए, पावों के तले रौंद दिया। मैं हूं एक राह में पड़ा हुआ बेबस पत्थर, गुज़रने वाले हर इक पांव ने मारी ठोकर। मैं इक किताब हूं जिसमें लिखी है सच्चाई, ना ही समझा है किसीने ना दुनियां पढ़ पाई। मैं इक दीया हूं जिसने भूल बस इतनी की है, जला है ख़ुद मगर औरों को रोशनी दी है। मैं आईना हूं जिसपे सबको है अभिमान बड़ा, दिखाई असली जो सूरत तो टूटना ही पड़ा। मैंने चाहा था किसी रोज़ गगन को छूना, आज मैं नीचे हूं ज़मीन के उससे दूना। वैसे सोचो तो निकल आएंगे कई नाम मेरे, छुपा हुआ हूं उसीमे जिसे है दर्द घेरे। ना मुझको समझो के हर दर्द की पहचान हूं मैं, मैं कोई और नहीं हूं बस एक इंसान हूं मैं। मैं को...

हम किधर जाएं ????

Image
है हिम्मत किसी भी राह से गुज़र जाएं, नहीं मालूम हो मंज़िल तो हम किधर जाएं ? हवा में बिखरी है ख़ुशबू चमन के फूलों की, गर ख़ुशबू से हो घुटन तो हम किधर जाएं ? नहीं गिला कोई चिरागों के ग़ुल होने से, जो उजाला ही हो दुश्मन तो हम किधर जाएं ? काम कांटों का है, फूलों का नहीं है चुभना, जो फूलों से लगे चोट हम किधर जाएं ? चेहरों में क्या रक्खा है वो तो हैं नकली, जो दिलों में ही हो खोट हम किधर जाएं ? ख़्वाब हसीन तो होते हैं मगर आँख खुले, कुछ भी ना हो हासिल तो हम किधर जाएं ? नहीं परवाह कोई ग़ैर जो जज़्बात से खेले, उनमें अपने भी हों शामिल तो हम किधर जाएं ? चले जायेंगे जहान से जो आएगी बारी, रो रोके पूछेगी उस दिन भी ख़ाक बेचारी। या तो मिल जाएं इस मिट्टी में या बिखर जाएं, बता मालिक मेरे, मर कर भी हम किधर जाएं?

मेरा घर

Image
जीवन की धूप और छांव में मिलता है कुछ आराम जहां कितने ही झोंखे तूफान के आये तो हों नाकाम जहां जहां खुशियों के शीतल झरने हर पल इक सुर में बहते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। जहां सुबह की किरणे आकर खेला करती हैं आंगन में जहां बरखा की बूंदें रिमझिम रिमझिम गिरती हैं सावन में जहां इन्द्रधनुष के सातों रंग आपस में मिलकर रहते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। जहां सुख दुःख सारे जीवन के आपस में बांटे जाते हैं जहां दीप जलाकर खुशियों के हर इक त्योहार मनाते हैं दुःख सागर की उठती लहरें जहां सब मिलजुलकर सहते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। मेहनत की अग्नि में जलकर जहां कंचन होती है काया जहां शाम ढले थक जाने पर मिले ममता की शीतल छाया नादान सभी ठोकर खाकर जहां गिरते और संभलते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं। जहां मन में इच्छा हो चलने की नई आशा की राह में आकाश सा ऊपर उठने में, सूरज छूने की चाह में जहां हर इक काली रात कटे और दिन भी रोज़ गुजरते हैं, उसको ही तो घर कहते हैं।

आंखें

Image
मुख की शोभा, मन का दर्पण, कहलाती हैं आंखें कह ना पाएं जो हम मुंह से, वो कह जाती हैं आंखें दिल पर चोट लगे, आंसू बन बह जाती हैं आंखें सपनें हों साकार, तो विस्मित रह जाती हैं आंखें दुनियां भरके कितने ही दुःख, सह जाती हैं आंखें लेकिन सब कुछ सह कर भी, चुप रह जाती हैं आंखें

कर्म फ़ल

Image
हे मानव,अपने कर्मों की है सज़ा आज तू काट रहा। बटोरे जो कर्मों के फल ले प्रभु आज वो बांट रहा।। कु दरत रूपी इस माता पर  क्यों तूने अत्याचार किया, क्या पाया है क्या लौटाया क्या इसपे कभी विचार किया। जिन पेड़ों के मीठे फल खाए जिनकी छाया में चैन मिला, आज अपनी गरज की खातिर तू उन पेड़ों को ही काट रहा।। नदियों और मीठे झरनों ने   कल तेरी प्यास बुझाई है, कचरे और प्लास्टिक से तूने आज उनकी शोभा बड़ाई है। जिन ठंडी हवाओं की थपकी  बचपन में तुझे सुलाती थी, गाड़ी कारखानों के धुएं से आज उसका गला ही घोंट रहा।। तेरे इन नीच इरादों ने जाति और धर्म को भी ना छोड़ा, तेरे लालच और मक्कारी ने उन्हें लील लिया थोड़ा थोड़ा। दंगों की शक्ल में भाई को  भाई से तूने लड़वाया, मंदिर मस्ज़िद को तोड़के तू ईश्वर का दिल भी उचाट रहा।। अब आई है बारी तेरी चल भाग कहां तक भागेगा, ना जाने क्या होगा तेरा कल सोकर जब तू जागेगा। मौत आएगी बीमारी से या बाढ़ तुझे बहा लेगी, भूकंप करेगा तबाह तुझे  या आग तेरा बदला लेगी। हर तरफ़ है हाहाकार म...