आख़िर इक दिन जाना है।


आए थे इक रोज़ जहां से, वहीं तो आख़िर जाना है।
घर-बार,प्यार, रिश्ते-नाते,सब यहीं धरा रह जाना है।।
जब धरती पर आने के लिए,
ईश्वर ने हमें तैयार किया।
तन ढकने को भी मानव को,
एक पत्ता तक ना दान किया।
ईश्वर ने कहा- ऐ मानव सुन,
तुझको धरती पर जाना है।
मैंने जैसा तैयार किया,
वैसे ही वापस आना है।
धरती पर पहले आते ही,
मानव ने सीख लिया रोना।
आंसू ही साथ निभाते हैं,
जब पड़ जाता है कुछ खोना।।
विश्वास पे अपनी चोट लगे,
तो क्यों आंखें भर आती हैं?
जीवन की छोटी सी ठोकर,
क्यों चोट हमें पहुंचाती है?
क्या आए थे लेकर जग में,
क्यों आशा है कुछ पाने की?
कुछ साथ नहीं ले पाएंगे,
जब होगी बेला जाने की।
फिर चाह हमें क्यों जीवन में,
औरों का हमको प्यार मिले?
हर कोई चाहे मुझको भी,
सपनों का इक संसार मिले।
दुःख,दर्द, हंसी और खुशियों को,
आख़िर इक दिन बह जाना है।
मिट्टी से बनी इस देह को आख़िर,
मिट्टी में मिल जाना है।
आए थे इक रोज़ जहां से वहीं तो आख़िर जाना है।
घर-बार, प्यार, रिश्ते- नाते सब यहीं धरा रह जाना है।।



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