कर्म फ़ल



हे मानव,अपने कर्मों की
है सज़ा आज तू काट रहा।
बटोरे जो कर्मों के फल
ले प्रभु आज वो बांट रहा।।
कुदरत रूपी इस माता पर 
क्यों तूने अत्याचार किया,
क्या पाया है क्या लौटाया
क्या इसपे कभी विचार किया।
जिन पेड़ों के मीठे फल खाए
जिनकी छाया में चैन मिला,
आज अपनी गरज की खातिर तू
उन पेड़ों को ही काट रहा।।
नदियों और मीठे झरनों ने  
कल तेरी प्यास बुझाई है,
कचरे और प्लास्टिक से तूने
आज उनकी शोभा बड़ाई है।
जिन ठंडी हवाओं की थपकी 
बचपन में तुझे सुलाती थी,
गाड़ी कारखानों के धुएं से
आज उसका गला ही घोंट रहा।।
तेरे इन नीच इरादों ने
जाति और धर्म को भी ना छोड़ा,
तेरे लालच और मक्कारी ने
उन्हें लील लिया थोड़ा थोड़ा।
दंगों की शक्ल में भाई को 
भाई से तूने लड़वाया,
मंदिर मस्ज़िद को तोड़के तू
ईश्वर का दिल भी उचाट रहा।।
अब आई है बारी तेरी
चल भाग कहां तक भागेगा,
ना जाने क्या होगा तेरा
कल सोकर जब तू जागेगा।
मौत आएगी बीमारी से
या बाढ़ तुझे बहा लेगी,
भूकंप करेगा तबाह तुझे 
या आग तेरा बदला लेगी।
हर तरफ़ है हाहाकार मचा
कहीं भूख कहीं लाचारी है,
निज पापों का मारा मानव
  लाशें बन बनकर लोट रहा।।






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